Wednesday, May 8, 2013


कई समय से अपने ब्लॉग पर कुछ लिखना चाहता था लेकिन काम की व्यस्तता की वजह से नहीं लिख पाया। खैर लम्बे इंतज़ार व अपने अथक प्रयास के चलते मुझे एक सफलता मिली और वो थी कि मेरी एक फोटोग्राफ फर्स्ट फ्रेम अंतरास्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के ऍफ़ 8  फोटोग्राफी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल करने में सफल रही। इसके लिए मै हार्दिक आभार करता हूँ अपने परिवार का , कॉलेज का, मित्रों,  का अपने फोटोग्राफी गुरु सुशांत घई का । जिनकी दुवाओं व हौसलाफजाई के कारन में यह पुरुस्कार जीत पाया । 

Wednesday, February 13, 2013



असली ताकत कहानी में होती है
अपनी पहली फिल्म 'ए वेडनसडे' में अपने निर्देशन व कहानी लेखन का लोहा मनाने वाले नीरज पाण्डेय इस बार लेकर आये हैं 'स्पेशल 26 '। इस फिल्म के साथ भी उनकी छवि बरकरार है और उन्होंने यह भी साबित किया है वह उन चुनिंदा निर्देशकों में से हैं जो कि रीमेक और परिहास के अलावा भी अच्छी व मूल कहानियों के साथ फिल्म बनाने में अटूट विश्वास रखते हैं ।


 'स्पेशल 26' वर्ष 1987 में घटी सच्ची घटनाओं पर आधारित है, जब मौन सिंह नाम के एक शख्स ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर नकली सीबीआई अफसर बनकर देश के कई शहरों में रेड डाली थी और करोड़ों का माल लेकर चंपत हो गया था। नीरज पाण्डेय ने इस घटना को बहुत बेहतरीन तरीके से रुपहले परदे पे उतरा है और वास्तविकता के काफी करीब लाकर खड़ा किया है। कई समय के बाद गंभीर भूमिका में नज़र आने वाले अजय यानी अक्षय कुमार ने अच्छा अभिनय किया है। फिल्म के लिए कम मेहनताना लेना उनकी भूमिका व कहानी के साथ जवाब देता है। अनुपम खेर का संवाद 'असली ताकत दिल में होती है' उनके अभिनय कि परिपक्वता कि ताकत को बखूबी दिखता है। जिमी शेरगिल और दिव्या दत्ता ने अपने पात्र के साथ न्याय किया। लेकिन अपनी हर फिल्म कि तरह इस फिल्म में भी  मनोज वाजपेयी का अभिनय सबसे उम्दा नज़र आता है।
फिल्म के अगर और विभागों कि बात करें तो इसका बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के साथ समकालीन चलता दिखता है। फिल्म का संगीत काफी बढ़िया है जो हिमेश रेशमिया को एक बार दोबारा यही याद दिलाता है कि वह इसी क्षेत्र के लिए बने हैं।
यदि फिल्म कि कहानी कि बात करें तो प्रोमो के हिसाब से साफ़ पता चल रहा था कि ये फिल्म असली व नकली सीबीआई के अस्तित्व कि जंग को दिखाएगी और पहले के मध्यांतर तक ये काफी हद तक सही भी साबित होती है लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म पूरी तरह से बदल जाती है ।
कुल मिलाकर यह एक बेहतरीन फिल्म है जो हिंदी सिनेमा में बहुत कम देखने को मिलती हैं। फिल्म का चरमोत्कर्ष (क्लाइमेक्स) सही मायने में चरमोत्कर्ष (क्लाइमेक्स) कहलाने के लायक है क्योंकि यह आपके सोच से परे जाकर फिल्म को बदल कर रख देता है । मुझ जैसे हर उस शख्स व वर्ग के लिए यह एक उत्कृष्ट फिल्म है जो थ्रिलर व परिहास के अलावा गंभीर व वास्तविकता दिखाने वाली फिल्मो के शौक़ीन हैं।

Saturday, January 26, 2013



चॉकलेट चॉकलेट और चॉकलेट...

हर दिन के जैसे आज भी क्लासेज खत्म होने के बाद हम सब मिलते हैं अल्का और नेहा मैम के क्यूबिकल में । जहाँ आज फिर से झंकार(कॉलेज पत्रिका) के काम का हिसाब किताब लिया जा रहा है । नेहा मैम ने आज झंकार में कुछ और पेज जोड़ने के लिए कहा है । खैर इसी बीच मेरे दो सहपाठी  श्वेता और कनिका बत्रा  भी आ गए हैं जो की अल्का मैम के कॉलेज छोड़ने के फैसले से आहत हैं और मैम से कॉलेज में बने रहने का आग्रह कर रहे हैं। इसके उलट मैम अपने फैसले पर अडिग हैं। अचानक नेहा मैम के गुस्से व निराश भरे स्वरों में मुझसे आशीष पीटर(झंकार टीम का सदस्य) की वर्तमान स्थिति के बारे में पुछा गया। मेरी ओर से हमेशा की तरह मैम से नज़र चुराने व फ़ोन बहार निकालकर पीटर को कॉल करने का दृश्य दोहराया गया।
तभी एकाएक श्वेता ने चॉकलेट का विषय छेड़ दिया। चॉकलेट का नाम सुनते ही अल्का मैम की ओर से "द चॉकलेट रूम " नाम के एक रेस्टोरेंट का ज़िक्र हुआ । नेहा व अल्का मैम के अनुसार इस रेस्टोरेंट में मिलने वाली सारी खाद्य सामग्री चॉकलेट से बनी हुई हैं।
हमने तुरंत ही मैम से इसका पता लिया और मै, कनिका ओर श्वेता निकल पड़े "द चॉकलेट रूम" का जायका लेने। मैंने अपने ज़िन्दगी के २० सालों में पहली बार इस तरह के किसी रेस्टोरेंट के बारे में सुना है। कॉलेज से निकलते ही हमने साकेत पीवीआर (अनुपम मार्किट) के लिए ऑटो लिया। वहां पहुँचने में हमें लगभग 15 मिनट लगे। वहां पहुँचते ही हमे बड़ी आसानी से वह रेस्टोरेंट मिल गया। लेकिन उसे देखकर यह भी अचम्भा हुआ की पिछले डेढ़ साल से हम इस जगह कई बार आये और इसकी ओर हमारा ध्यान कभी नहीं गया। 
 "द चॉकलेट रूम" में प्रवेश करते ही हमें तीन,चार लोग ही बैठे दिखाई दिए। हम भी अपनी सुविधा अनुसार बैठ गए। तभी मेज़ पर पड़े मेन्यु पर हमने अपनी नज़र दौड़ाई। किन्तु चॉकलेट से बनी सारी चीज़ों के कारण हम असमंजस में पड़ गए कि क्या ऑर्डर करें और क्या नहीं ? इतने में कनिका कि ओर से नेहा मैम को कॉल करने का सुझाव दिया गया। मैंने नेहा मैम को कॉल की और उनके स्वादानुसार उपयुक्त चीज़ ऑर्डर करने का सुझाव मांगा। मैम की ओर से हमें कई विकल्प दिए गए किन्तु हमारी जेब और उच्चारण के हिसाब से हमें “chocolate ecstasy” और “chocolate lava lava” ही सबसे बेहतर नज़र आये। अगले 15 मिनट में हमारे सामने दोनों चीज़ें रखी गयी। लेकिन अब यह समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें “chocolate ecstasy” कौन सी है और  “chocolate lava lava” कौन सा?
 खैर तभी 12वीं  में भौतिकी पढ़ाने वाले सर कि एक बात याद आ गयी कि बेटे कभी तो कॉमनसेंस का प्रयोग किया करो। मैंने अभी  दिमाग के घोड़े दौड़ाने शुरू ही किये थे कि मेरा ध्यान सामने पड़ी दोनों डिश पर गया। जिसमें एक डिश से दो चम्मच गायब थे और गौर किया तो पाया कि सोचने विचारने के चलते कनिका बत्रा और श्वेता गौर अब तक सामने सजे व्यंजनों में से एक का स्वाद ले भी चुके हैं। मैंने भी दिमाग के घोड़ों पर लगाम लगाई और खाना शुरू किया । पहले चम्मच के साथ ही चॉकलेट का आत्मा को तृप्त करने वाला स्वाद दिल तक उतर गया । यह मेरे जीवन में चॉकलेट से बना सबसे बेहतरीन व्यंजन था। खाने के साथ साथ यह भी अनुमान लगा लिया कि दूसरी प्लेट में दो छोटे- छोटे गिलासों में सजी डिश ही “chocolate lava lava” है क्योंकि इसमें दो lava lava के दो गिलास हैं। खैर संकल्पना कितनी भी हास्यास्पद व कल्पनामय हो किन्तु स्वाद उतना ही वास्तविक व गंभीर था। इसके बाद हमने "chocolate lava lava "  का स्वाद लिया। "द चॉकलेट रूम" के ये दोनों ही जायके मेरे लिए अविस्मरणीय हैं। उस बेहतरीन जायके के लिए मै अपनी दोनों मैम(नेहा मैम  व अल्का मैम) का आभारी हूँ।  हर वह व्यक्ति जो  चॉकलेट का  शौक़ीन है उसके लिए के लिए सबसे यथोचित गन्तव्य "द चॉकलेट रूम" है।
दिल्ली में यह सिर्फ दो ही जगहों में है-
contact no.:(011) - 40572888
email : 
2-delhi - sector 3
contact no.:(011) - 42340564
email : tcr.nnmallrohini@gmail.com

1- delhi - saket pvr anupam market
comimunity center - 17,malviya nagar , saket pvr anupam market , delhi - 110017

g:-11, plot no. 15,n.n.mall, rohini, , sector 3 , delhi - 110085

Friday, January 25, 2013


परतंत्र हिंदुस्तान में स्वतंत्र हिंदुस्तानी

आज़ादी की वर्षगांठ यह जानने का मौका होती है ।कि सदियों के बाद नसीब हुई आज़ादी को हमने देश की बेहतरी में कितना बदला है। यदि भारत की वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो यह तुश्टिजनक नहीं है इन 65 सालों में भारतीय लोकतंत्र का चेहरा बदल चुका है। इस बदले चेहरे में हिंदुस्तानी तो आजाद हैं किंतु हिंदुस्तान आज भी कुरीति अव्यवस्था रूपी पराधीनता की जंजीरों में जकड़ा हुआ नजर आता है। आज हिंदुस्तानियों को आज़ादी है भ्रष्टाचार बलात्कार सामुदायिक दंगे आदि करने की। जबकि दूसरी तरफ हमारा देश हिंदुस्तान महाभारत के उस भीश्म की तरह नजर आता है जो बाणों की शैया पर लेटकर अपनी संस्कृति कुटुम्ब का सर्वस्व विनाश देखने के लिए मजबूर है।
आज के आधुनिक भारत में सामाजिक विषमता की गहरी खाई है। एक तरफ विश्व के 50 सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में 3 भारतीय हैं तथा देश में करोड़पतियों की संख्या 1 लाख हो गई है । जबकि दूसरी तरफ देश  का एक बड़ा वर्ग अभी तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और मंहगाई बढ़ने के बावजूद गरीबी की रेखा 22 32 रूपए के बीच झूल रही है। 
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में शुमार इस भारत देश में मुख्यमंत्री का कार्टून बनाने वाले प्रोफेसर को जेल भेज दिया जाता है। भ्रष्टाचार के आरोप में कुर्सी गंवाने वाले एक ताकतवर मुख्यमंत्री अपनी जगह आए ईमानदार मुख्यमंत्री को बदलने में सफल हो जाता है| वहीं आजाद हिंदुस्तानी भी देश के नेकनीयत शख्स को सत्ता से उतारने का माद्दा रखते हैं। एक तरफ देश  की महिलाएं विदेषों में जाकर देश को गौरवांवित कर रहीं हैं जबकि दूसरी तरफ अपने ही देश  में लड़कियों के लिए जींस और मोबाईल से परहेज करने का पंचायती फरमान जारी होता है तथा सबसे ज्यादा पेड़ों को काटने वाली कंपनियां ही देश में युवाओं को हरे कपड़ों में दौड़ाकर हरियाली बढ़ाने का नारा दे रहीं हैं।
अगर हम सही मायने में भारतीय हैं तो हमें मानवता के कल्याण के लिए एक ठोस कदम उठाने की जरूरत है। यदि हम ऐसा करने में सफल होते हैं तो तब हम सही मायने में सच्चे भारतीय कहलाने के पूरे हकदार हैं अन्यथा नहीं।  इसके अलावा हमारे नीति नियंताओं को ईमानदार संवेदनशील बनाने की जरूरत है।