Friday, January 25, 2013


परतंत्र हिंदुस्तान में स्वतंत्र हिंदुस्तानी

आज़ादी की वर्षगांठ यह जानने का मौका होती है ।कि सदियों के बाद नसीब हुई आज़ादी को हमने देश की बेहतरी में कितना बदला है। यदि भारत की वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो यह तुश्टिजनक नहीं है इन 65 सालों में भारतीय लोकतंत्र का चेहरा बदल चुका है। इस बदले चेहरे में हिंदुस्तानी तो आजाद हैं किंतु हिंदुस्तान आज भी कुरीति अव्यवस्था रूपी पराधीनता की जंजीरों में जकड़ा हुआ नजर आता है। आज हिंदुस्तानियों को आज़ादी है भ्रष्टाचार बलात्कार सामुदायिक दंगे आदि करने की। जबकि दूसरी तरफ हमारा देश हिंदुस्तान महाभारत के उस भीश्म की तरह नजर आता है जो बाणों की शैया पर लेटकर अपनी संस्कृति कुटुम्ब का सर्वस्व विनाश देखने के लिए मजबूर है।
आज के आधुनिक भारत में सामाजिक विषमता की गहरी खाई है। एक तरफ विश्व के 50 सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में 3 भारतीय हैं तथा देश में करोड़पतियों की संख्या 1 लाख हो गई है । जबकि दूसरी तरफ देश  का एक बड़ा वर्ग अभी तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और मंहगाई बढ़ने के बावजूद गरीबी की रेखा 22 32 रूपए के बीच झूल रही है। 
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में शुमार इस भारत देश में मुख्यमंत्री का कार्टून बनाने वाले प्रोफेसर को जेल भेज दिया जाता है। भ्रष्टाचार के आरोप में कुर्सी गंवाने वाले एक ताकतवर मुख्यमंत्री अपनी जगह आए ईमानदार मुख्यमंत्री को बदलने में सफल हो जाता है| वहीं आजाद हिंदुस्तानी भी देश के नेकनीयत शख्स को सत्ता से उतारने का माद्दा रखते हैं। एक तरफ देश  की महिलाएं विदेषों में जाकर देश को गौरवांवित कर रहीं हैं जबकि दूसरी तरफ अपने ही देश  में लड़कियों के लिए जींस और मोबाईल से परहेज करने का पंचायती फरमान जारी होता है तथा सबसे ज्यादा पेड़ों को काटने वाली कंपनियां ही देश में युवाओं को हरे कपड़ों में दौड़ाकर हरियाली बढ़ाने का नारा दे रहीं हैं।
अगर हम सही मायने में भारतीय हैं तो हमें मानवता के कल्याण के लिए एक ठोस कदम उठाने की जरूरत है। यदि हम ऐसा करने में सफल होते हैं तो तब हम सही मायने में सच्चे भारतीय कहलाने के पूरे हकदार हैं अन्यथा नहीं।  इसके अलावा हमारे नीति नियंताओं को ईमानदार संवेदनशील बनाने की जरूरत है।                                                                 

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